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राजभाषा मनुष्य के संस्कार संचेतना और विकास का आधार होती है | इसलिए उसके माध्यम से शिक्षण एवं प्रशिक्षण सबसे सहज और प्रामाणिक होता है | राजभाषा का सर्वांगीण विकास मूलतः देश का ही विकास है, आमजन का विकास है | इस बात को ही ध्यान में रखते हुए संस्थान के कई संकाय सदस्यों की कई पुस्तकें न केवल हिन्दी में प्रकाशित हुई है बल्कि पुरुस्कृत भी हुई हैं | राजभाषा के प्रति संस्थान सदैव ही सजग एवं वचनबद्ध रहा है एवं इसके प्रचार प्रसार के भी प्रयासों में अग्रणी रहा है |